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Wednesday, December 16, 2009

मुस्लिम प्रधानमंत्री का लॉलीपॉप - यूसुफ़ अंसारी

कांग्रेस के महासचिव और भविष्य में प्रधानमंत्री पद के सबसे मज़बूत दावोदार और उम्मीदवार राहुल गांधी ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में ये कह कर मुसलमानों को रिझाने की कोशिश की है कि मुसलमान भी देश का प्रधानमंत्री बन सकता है। प्रधानमंत्री बनना धर्म नहीं बल्कि क़ाबिलियत पर निर्भर करता है। ये बात उन्होंने एक सवाल के जवाब में ये बात कही है। राहुल गांदई ने कहा तो ठाक ही है। किसी मुसलमान के प्रधानमंत्री बनने पर न संविधान में कोई रोक है और न ही क़ानून में। प्रधानमंत्री बनना राजनीतिक परिस्थितियों पर भी निर्भर करता है। राहुल के बयान से एक नई बहस छिड़ी है। ये बहस कहीं न कही देश को 1947 तक ले जाती है। देश का बंटवारा ही इस बात को लेकर हुआ कि प्रधानमंत्री कौन हो। अगर उस वक्त जवाहर लाल नेहरू महात्मा गांधी की बात मानते हुए मोहम्मद अली जिन्ना को प्रधानमंत्री बनाने के लिए राज़ी हो जाते तो देश का विभाजन टल सकता था। ये सवाल उस वक्त जितना महत्वपूर्ण था आज भी उतना ही महत्वपूर्ण हैं।
पहले इस बात पर ग़ौर किया जाए कि क्या देश में कोई मुस्लिम राजनेता ऐसा है जिसमें प्रधानमंत्री बनने के गुण दिखते हों। जिस पर देश भरोसा कर सके कि ये व्यक्ति देश की बागडोर संभालने की क्षमता रखता है। दूसरा सवाल ये है कि ये तय कौन करेगा कि किस व्यक्ति में प्रधानमंत्री बनने की क्षमता है। मनमोहन सिंह मे प्रधानमंत्री बनने की क्षमता है इसका फैसला 2004 में कंग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने किया था। लेकिन क्या मनमोहन सिंह सिर्फ क़ाबिलियत के भरोसे प्रधानमंत्री बनाए गए। अगर हां तो क्या प्रणव मुख्रर्जी मे प्रधानमंत्री बनने की क्षमता नहीं थी या इस वक़्त नहीं है। अगर नहीं तो फिर क्यों पिछली सरकार में प्रणव मुखर्जी को 60 से ज़्यादा मंत्रियों के समूह की अध्यक्षता क्यों सौंपी गयी। प्रणव मुखर्जी को अगर क़ाबिलियत के होते हुए प्रधानंमत्री बनने का मौक़ा नहीं मिला तो इस लिए कि वो इंदिरा गांधी की मौत के बाद के बाद प्रधानमंत्री पद के दावेदार थे और राजीव को प्रधानमंत्री बनाए जाने के विरोध में उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी थी। उसके बाद वो कांग्रेस में वापिस तो आ गए लेकिन सोनिया गांधी का भरोसा उस हद तक नहीं जीत पाए कि प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठ पाते। ज़ाहिर है कि वो कभी दस जनपथ के उतना वफादार नहीं रहे जितने मनमोहन सिंह रहे। वफादारी क़ाबिलियत पर भारी पड़ी। राहुल गांधी में प्रधानमंत्री बनने के तमाम गुण मौजूद हैं क्योंकि वो ख़ुद ऐसे घर मे पैदा हुए हैं जिसने देश को तीन प्रधानमंत्री दिए हैं। राहुल गांधी की टीम के तमाम लोगों की सबसे बड़ी क़ाबिलियत उनका मंत्रियों के घरों मे पैदा होना ही है। राहुल गांधी की टीम में ज़्यादातर वहीं हैं जिनेक पिता राजीव गांधी या फिर इंदिरा गांधी के मंत्रीमंडल में रहे हैं। मंत्री बनने लायक क़ाबिलियत तो किसी मुसलमान मे हो सकती है लेकिन वो प्रधानंमत्री बनने लायक क़ाबिलियत कहां से लाए। प्रधानमंत्री तो कोई मुसलमान पहले हुआ ही नहीं।
चलो मान भी लें कि मुसलमान प्रधानमंत्री बन सकता है तो क्या राहुल गांधी बताएंगे कि वो शुभ दिन कब आएगा। मुझे तो अगली आधी सदी इसकी कोई उम्मीद नज़र नहीं आती। अभी केंद्र में कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार है। इसका कार्यकाल 2014 तक है। इसके प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हैं। यानि 2014 तक तो मनमोहन सिंह ही प्रधानमंत्री रहेंगे। उसके बाद अगर कांग्रेस की अकेले या फिर उसके गंठबंधन की सरकार बनती है तो प्रधानंमत्री खुद राहुल गांधी हो जाएंगे। अल्लाह उन्हें उम्र दराज़ करे तो कम से कम अगले चालीस साल तो कांग्रस मे उऩके अलावा प्रधनंमत्री पद के लिए किसी और का नंबर आने से रहा। बीजेपी तो मुसलमान के नाम से वैसे ही बिदकती है। लिहाज़ा उसकी तरफ से ऐसी किसी ग़लती की उम्मीद एकदम नहीं है। बचे बाक़ी दल तो उनमें मायावती, शरद पवार, मुलायम सिंह यादव, लालू यादव और रामविलास पासवान ख़ुद ही प्रधानमंत्री पद की दावेदारी ठोकते हैं। वो भला क्यों किसी मुसलमान को प्रधानमंत्री बनाने की वकालत करेगें। राम विलास पासवान तो बिहार में मुस्लिम मुख्यमंत्री का नारा देकर नतीजे भुगत चुके हैं। 2005 में पासवान ने बिहार वॆदान सभा में 29 सीटें जीती थी। अपना समर्थन देने के लिए उन्होंने लालू यादव और नीतीश कुमार के सामने किसी मुसलमान को मुख्यमंत्री बनाने की मांग रखी और उस पर अड़ गए। नतीजा क्या हुआ ? उसी साल हुए दोबारा हुए विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी सिर्फ़ 8 सीटों पर सिमट गयी। लोक सभा में पार्टी का सूपड़ा साफ हो गया, खुद अपना चुनीव भी वो हार गए।
दर असल मुसलमानों के राजनीतिक सशक्तिकरण को लेकर अब कोई पार्टी गंभीर नहीं हैं। सबको अपना वोट खिसकने का डर रहता है। कांग्रेस अब पहले की तरह गंभीर नहीं रह गयी है। इसकी एक वजह उसका देशभर में कमजोर होना भी हो सकती है। क्योंकि ये सच है कि एक ज़माने में मुसलमानों के सशक्तिकरण के लिए कांग्रेस ने ही क़दम उठाए। कम ही लोग जानते हैं कि आज़ादी के बाद जम्मू-कश्मीर को छोड़कर देश के 6 राज्यों में मुस्लिम मुख्यमंत्री हुए हैं। एक को छोड़ कर सभी कांग्रेस के रहे। ये सारे मुख्यमंत्री तब हुए जब कांग्रेस की कमान इंदिरा गांधी के हात में थी। सबसे पहले राज्स्थान में बरकतुल्लाह ख़ान जुलाई 1971 से अगस्त 1973 तक दो साल से ज़्यादा मुख्यमंत्री रहे। उत्तर-पूर्वी राज्य मणिपुर में मोहम्मद अलीमुद्दीन मार्च 1972 से मार्च 1973 तक क़रीब साल भर तक कांग्रेस से मुख्यमंत्री रहे। बाद में वो मणिपुर पीपुल्स पार्टी की तरफ से 1974 में मार्च से जुलाई तक चार महीने के लिए मुख्यमंत्री बने। बिहार में अब्दुल ग़फूर जुलाई 1973 से अप्रैल 1975 तक क़रीब पौने दो साल मुख्यमंत्री रहे। केरल मे कांग्रेसक के समर्थन से अक्टूबर 1979 से दिसंबर 1979 तक क़रीब तीन महीने तक मुस्लिम लीग के सी एच मोहम्मद कोया मुख्यमंत्री रहे। महाराष्ट्र में ए आर अंतुले जून 1980 से जनवरी 1982 तक क़रीब डेढ़ साल मुख्यमंत्री रहे। असम में अनवरा तैमूर दिसंबर 1980 से जून 1981 तक क़रीब सात महीने तक मुख्यमंत्री रहीं। हालांकि कोई भी मुस्लिम मुख्यमंत्री अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया लेकिन इनके बाद किसी भी राज्य में कोई मुस्लिम मुख्यमंत्री बना ही नहीं। किसी में इतनी क़ाबिलियत नहीं थी या हालात ऐसे नहीं रहे। या फिर कांग्रेस नेतृत्व में किसी मुस्लिम को मुख्यमंत्री बनाने की इच्छा शक्ति बाक़ी न रही।
इस देश को उन 10 से 15 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले राज्यों में मुस्लिम मुख्यमंत्री देने वाली कांग्रेस आज किस मुक़ाम पर खड़ी है ? कांग्रेस संगठन की बात करें तो आज कांग्रेस में एक भी प्रदेश अध्यक्ष मुसलमान नहीं हैं। किसी भी राज्य में विधायक दल का नेता मुसलमान नहीं है। केंद्रीय संगठन पर ग़ौर करे तो यहां भी मुसलमानों की कमी साफ जलकती है। हालांकि पार्टी में सोनिया गांधी के बाद उनके राजनीतिक सचिव अहमद पटेल ही सर्वेसर्वा हैं। लेकिन संगठन मे मुसलमानों का नुमाइंदगी के तौर पर 9 में से सिर्फ़ दो महासचिव हैं- ग़ुलाम नबी आज़ाद और मोहसिना क़िदवई। पार्टी के 8 स्वतंत्र प्रभारियों में से एक भी मुसलमान नहीं हैं। पार्टी के 39 सचिवों में पांच मुसलमान हैं- परवेज़ हाशमी, शकीलुज़्जमां अंसारी, अब्दुल मन्नान अंसारी, महबूब अली क़ैसर और मिर्ज़ा इरशाद बेग। यूपीए सरकार की बात करें तो मनमोहन सिंह के नए मंत्रीमंडल में मुसलमानों की हिस्सेदारी उनके पिछले मंत्रीमंडल से कम हो गयी है। पिछली बार तीन मुस्लिम केबिनेट मंत्री थे इस बार कुल दो हैं। इनमें एक ग़ुलाम नबी आज़ाद और कांग्रेस के हैं और दूसरे फारूक़ अब्दुल्लाह सहयोगी दल नेश्नल कांफ्रेस से। एक स्वतंत्र प्रभार के साथ राज्य मंत्री सलमान खुर्शीद हैं। सरकार में एक केबिनेट और दो राज्यमंत्री सहयोगी दलों की तरफ से हैं। जो पार्टी जीते हुए सांसदों को मंत्री बनाने से कतराती है उससे किसी मुसलमान को प्रधानमंत्री बनाने की उम्मीद रखना बेमानी है। अब तो कांग्रेस मुसलमानों तको राज्यपाल तक बनाने मे कंजूसी करने लगी है। झारखंड के राज्य पाल सैयद सिब्ते रज़ी का कार्यकाल पूरा होने बाद देश में कोई मुस्लिम राज्यपाल नहीं होगा। अभी तक तो किसी की नियुक्ति हुई नहीं है।
कांग्रेस को तो टिकट देने लायक क़ाबिल मुसलमना तक नहीं मिलते। 2007 मे गुजरात विधानसभा चुनाव मे पार्टी ने डरते डरते 7 मुसलमानों को टिकट दिए उनमे से 6 जीत गए। हाल ही में हुए हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में भी कांग्रेस ने क़ाबिलियत नहीं होने का बहाना बना कर मुसलमानो को कम टिकट दिए। दरअसल 2005 में कांग्रेस ने पांच टिकट मुसलमानों को दिए थे जिनमे केवल एक ही जीत पाया था, वो पूरी विधानसभा मे अकेला। लिहाजा इस बार उसने तीन ही टिकट दिए उनमे एक जीता। चार और जीत गए। इसी तरह महाराष्ट्र में में कांग्रेस ने मुसलमानों के कम टिकट दिए लेकिन उनकी जीत का रिकार्ट पार्टी के आंकलन से कहीं बेहतर साबित हुआ। सावल ये है जब टिकट के बंटवारे में ही आप नाम तकाट देंगे तो हिस्सेदारी के लिए आगे कितने लोग बंचेंगे। किसी भी चुनाव मे टिकटों के बंटवारे के वक़्त पार्टी में आम सोच ये रहती है कि किसी मुसलमान को टिकट देने से ध्रुवीकरण हो जाएगा और इससे कांग्रेस को नुक़सान होगा। यानि पार्टी को अपने ही कार्यकर्ताओं, समर्थकों और वोटरों की धर्मनिरपेक्षता पर ही भरोसा नहीं हैं।
मुसलमानों को राजनीति मे हिस्सेदारी देने के मामले में राहुल गांधी कितने गंभीर हैं इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जिस राहुल टीम की बात मीडिया में उछाली जाती है उसमें एक भी मुसलमान नहीं। राहुल गांधी की पहल पर लोकसभा चुनाव में पार्टी ने युवक कांग्रेस से दस टिकट दिए इनमें एक भी मुसलमान नहीं था। नौजवान सांसद हमदुल्लाह सईद को टिकट उनके पिता पीएम सईद की मौत की वजह से मिला। विधान सभा चुनाव में किसी भा राज्य में राहुल गांधी ने किसी मुस्लिम नौजवान के लिए टिकट की वकालत नहीं की। दरअसल राहुल गांधी अलीगढ़ में अपने राजनीतिक जीवन में पहली बार पढ़े लिखे मुस्लिम नौजवानों से रूबरू हुए। उन्हें वहां मुसलमानों से जुड़ें कई अहम मुद्दों पर तीखे सवालों का भी सामना करना पड़ा। ऐसे ही तीखे सवाल के जवाब में उन्होंने मुस्लिम प्रधानमंत्री बनने की बात कह दी। इसका ये मतलब नहीं है कि वो किसी मुसलमान को प्रधानमंत्री बनानाचाहते हैं। राहुल गांधी ने 2012 वलिधानसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को सत्ता में वापस लाने का संकल्प लिया है। इसके लिए उन्हे मुस्लिम वोटों की ज़रूरत है। पिछले चुनाव में वो टोपी लगा कर देवबंद की सड़कों पर घूमे थे। लेकिन वहां उन्हे वोट नहीं मिला। क्या मुस्लिम प्रधानमंत्री झूठा ख़्वाब दिखा कर वो मुसलमानों के वोट हासिल कर सकते हैं ? शायद नहीं। उन्हें ये समझना होगा कि मुस्लिम प्रधानंमत्री का लॉलीपॉप थमा कर वो कांग्रेस के लिए मुसलमानों की हमदर्दी तो हासिल कर सकते हैं लेकिन उनका वोट नहीं। मुसलमान आज समाज के दूसरे तबक़ों की तरह सत्ता में हर तरह से अपनी हिस्सेदारी चाहता है। मुसलमानों का वोट हासिल करने के लिए राहुल गांधी को ये सुनिश्चित करना होगा कि कांग्रेस और उसके नेतृत्व वाली सरकार इस कसोटी पर खरी उतरे।
(लेखक ज़ी न्यूज़ के सहायक संपादक हैं।)

Tuesday, November 17, 2009

धनगर्भा की सियासी जंग - कागज की तलवार

कल एक बार फिर झारखंड पहुंचा। ज़ाहिर है प्रदेश में चुनाव की रणभेरी बज चुकी है। अखाड़े में हर योद्धा ताल ठोंक रहे हैं लेकिन इन सबके बीच मधु कोड़ा के खिलाफ खुल गए पैसे के खेल ने मामले को और भी दिलचस्प मोड़ पर ला खड़ा किया है। दरअसल राष्‍ट्रीय फलक पर मधु कोड़ा फिलहाल झारखंड की राजनीति में अकेले खलनायक भले ही दिख रहे हों लेकिन झारखंड को जानने वाले ये बात भली भांति जानते हैं कि न तो वो अकेले खलनायक हैं और न ही ये खेल झारखंड के परिदृश्य पर कोई नया है। कई नाम हैं जो पांच चरण के चुनाव के दौरान हो सकता है सामने आए, लेकिन इस भुलावे में मत रहिएगा कि वो नाम भी सामने आएँगे जो वास्तव में कहीं दूर बै‌ठे रांची का ये खेल खेल रहे थे। सही मायनों में अगर देखा जाए तो मधु कोड़ा का नाम सामने आना , कहीं भी झारखंड में पारदर्शी हो रहे सरकारी व्यवस्था या ईमानदारी होती व्यवस्था का नमूना नहीं है। बल्कि धूमिल की पंक्ति को अगर उधार लें तो .... सरल सूत्र उलझाऊ निकले बापू जी के तीन बंदर , वाली पंक्ति को ही चरितार्थ करता है।

मतलब ये कि कोड़ा सियासी चाल के एक मोहरे भर हैं जिसके जरिए ये दिखाने की कोशिश हो रही है कि पिछले कुछ सालों से झारखंड में लूट का जो सियासी खेल चला , हम उसके हिस्सा नहीं है। हमारा दामन साफ है। यानि की मेरी कमीज मैली नहीं है। और सबसे बड़कर अब झारखंड की जनता को उनकी सियासी किस्मत हमारे हाथ में सौंप देना चाहिए ताकि हम उनका विकास कर सकें। और इसके बाद चुनाव पर्व निपट जाएगा। अगर एक पार्टी या गठबंधन को सत्ता मिल गई तो भी और नहीं मिला तो भी ये सिलसिला चलता रहेगा। मधु कोड़ा का मामला चारा घोटाले की तरह वक्त की धूल के नीचे कहीं दब जाएगा। जनता यूं ही कराहती रहेगी। और ये नहीं हुआ तो अभी गला फाड़ फाड़ कर ईमानदारी की दुहाई देने वाले साथ बैठकर फोटो खिंचवाएंगे और जनता के हित में एक स्थायी सरकार बनाने के लिए इधर उधर स्थानांतरित होते रहेंगे। हमारे आपके हाथ में आएगा क्या कद्दू । इसलिए इन राजनेताओं के झांसे से बचिए लेकिन आपके पास विकल्प भी तो नहीं। आखिर किसी को तो चुनिएगा। जिसको चुनिएगा वही दुहेगा। आगे कुछ अच्छा मिलेगा तो आपको भी बताउंगा। इति

Tuesday, September 22, 2009

झारखंड में संभावित सिंगूर की आशंका में मित्तल चले टाटा की राह

झारखंड से खबर आ रही है कि इस्पात आईकान मित्तल टाटा की राह पर चल निकले हैं। झारखंड की खूंटी ज़िले के टोरपा में मित्तल की प्रस्तावित चालीस हज़ार करोड़ की एकीकृत स्टील प्लांट की योजना को पलिता लग सकता है। दरअसल विस्थापन विरोधी समुहों द्वारा स्टील प्लांट के पुरज़ोर विरोध की वजह से मित्तल ने प्लांट को झारखंड में ही कहीं और ले जाने का तो फैसला कर लिया है लेकिन अगर बात फिर भी नहीं बनी तो हो सकता है राज्य को चालीस हज़ार करोड़ रूपए की इस महत्वपूर्ण परियोजना से हाथ धोना पड़ जाए।

मित्तल को अपनी इकाई लगाने के लिए छह हज़ार एकड़ जमीन की जरूरत थी लेकिन विस्थापन विरोधी कुछ आंदोलनकारियों ने इसके लिए ज़मीन देने से ये कह कर इंकार कर दिया है कि वो किसी प्लांट की स्थापना के लिए किसी भी कीमत पर अपनी खेतिहर ज़मीन नहीं देंगे। लिहाज़ा मामल फंस गया है। वर्ष २००५ में मित्तल ने झारखँड सरकार के साथ १२ मिलियन टन उत्पादन वाली स्टील प्लांट लगाने संबंधी एक समझौते पत्र पर हस्ताक्षर किया था। हालांकि फिलहाल प्लांट के लिए किसी वैकल्पिक स्थान का चयन नहीं किया गया है।

Monday, September 21, 2009

बिहार में खुलेगा एएमयू का कैंपस

मुख्यमंत्री ने दिए सौ एकड़ जमीन

किशनगंज में होगा अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय

उन्नीस सितंबर को बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के उप कुलपति प्रो. पी के अब्दुल अजीस को पत्र लिखकर राज्य के किशनगंज ज़िले में विश्वविद्यालय को सौ एकड़ ज़मीन देने का प्रस्ताव किया है। मुख्यमंत्री ने उप कुलपति को लिखे अपने पत्र में कहा है कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के बिहार में सेंटर खोलने के प्रस्ताव से उन्हें खुशी हुई है और इसके लिए उनकी सरकार बिहार के मुस्लिम बहुल किशनगंज ज़िले में सौ एकड़ का जमीन मुफ्त उपलब्ध कराने को तैयार है। इससे शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़े रह गए इस ज़िले को और ख़ासतौर पर अल्पसंख्यक समुदाय को लाभ होगा। ज़ाहिर है शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़ते गए बिहार के लिए सरकार की तरफ से ईद का तौहफा है। इसके साथ ही उन्होंने विश्वविद्यालय प्रशासन से अपील की है कि वो इस कार्य को जल्द से जल्द मुकाम तक पहुंचाएं।

Friday, September 18, 2009

नीतिश जी संभलिए वरना ...


बिहार विधानसभा की 18 सीटों के लिए हुए उपचुनावों के परिणाम को देखते हुए ये कहने में गुरेज़ नहीं होना चाहिए कि लालू प्रसाद और रामविलास पासवान ने अच्छा प्रदर्शन किया है जबकि सत्तारुढ़ जद (यू) और बीजेपी को झटका लगा है । 18 सीटों पर हुए उपचुनावों में आरजेडी को छह और लोक जनशक्ति पार्टी को तीन सीटें मिली हैं । दूसरी तरफ़ पिछले लोकसभा चुनावों में बेहतरीन प्रदर्शन करने वाली जद यू को मात्र तीन और बीजेपी को दो सीटें मिली हैं। इसके अलावा कांग्रेस दो सीटें निकालने में कामयाब रही तो बहुजन समाज पार्टी भी एक पर जीत दर्ज़ करने में सफल रही जबकि एक सीट निर्दलीय उम्मीदवार के खाते में गई।


बिहार में पिछले लोकसभा चुनावों में जद यू और बीजेपी के गठबंधन ने 40 में से 33 सीटें जीती थीं जबकि राजद को मात्र तीन सीटों से संतोष करना पडा था। रामविलास पासवान की लोजपा का सुफड़ा साफ हो गया था। इसके मद्देनज़र विधानसभा उपचुनाव के परिणाम काफ़ी चौंकाने वाले हैं। कुछ प्रेक्षक इसे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के शासन की ख़ामियों और लालू प्रसाद की वापसी के तौर पर देख रहे हैं। परिणाम इसलिए भी चौंकाने वाले हैं कि इसमें लालू और रामविलास की जीत जीतना नहीं दिख रहा है उतना नीतिश की हार दिख रही है। ज़ाहिर छवि गढ़ने में माहिर नीतिश को बिहार की जनता की तरफ से पहला झ‍टका मिला है। इसका महत्व इस बात में नीहित है कि नीतिश अपने कार्यकाल में काम के जो दावे कर रहे हैं उससे बिहार की जनता उतनी प्रभावित नहीं है जितनी कि मीडिया।


परिणामों के बाद नीतीश कुमार का कहना था कि वो अपने काम से नहीं डिगेंगे और विनम्रता से परिणामों को स्वीकार करते है । उनका कहना था कि वो अपने बाकी के कार्यकाल में पूरी लगन से काम करते रहेंगे और फिर जनता के पास काम के साथ जाएंगे। ज़ाहिर है ये बेहतरीन स्परीट है लेकिन ये काम दिखता भी रहना जरूरी है। नीतिश जी को समझना होगा कि विकास के प्रति बिहार की जनता की भूख बढ़ चुकी है। पुराने समीकरणों से बिहारी अब संतुष्ट नहीं होने वाले। सड़क और कानून व्यवस्था शुरूआत के लिए तो ठीक है लेकिन यही मंजील नहीं हो सकती। जिस तरह लोगों ने लालू से आज़िज आ कर नीतिश को कुर्सी थमाई उन्हें लगा कि उन्हें कूंजी मिल गई लेकिन कूंजी के पीछे की सच्चाई बदलाव को वो पूरी तरह नहीं समझ पा रहे लगता है। राजनीति के उन्हीं पुराने समीकरणों से बिहारियों की क्षुधा संतुष्ट नहीं की जा सकती नीतिश जी। साथ ही बिहारी जनता अब बीस साल इंतजार करने के मूड में भी नहीं है। डेलिवर कीजिए नहीं तो रास्ता नापिए।
कल तक राजद की मलाई चाट रहे श्याम रजक और रमई राम किस क्राइटेरिया में आपकी पार्टी के टिकट के अनुरूप हो गए। भाई भतीजा को टिकट नहीं देने की बात तो समझ में आई लेकिन पुराने घाघों को जिनसे आज़िज आ कर आपका कुर्सी दी थी , उन्हीं को फिर से स्थापित करने में आपने कौन सी समझदारी दिखाई ? जिस जातिवादी राजनीति से बिहार तंग आ चुका था आप भी महा - आयोग आदि कदम उठा कर कहीं न कहीं उसी को मजबूत करते दिख रहे हैं। किसी पत्रकार मित्र ने ये तो कहा कि तमाम ठेकों , जनवितरण प्रणाली आदि के ठेकों तक में आप इस बात का ध्यान रख रहे हैं। मुझे नहीं पता कि हकिकत क्या है लेकिन आप तो छवि गढ़ने में माहिर हैं जरा ध्यान रखिएगा। जिन पुराने रास्तों पर चलकर लालू रसातल पहुंचे उस पर चलना अच्छा या कि नए रास्ते चुने जाएं। पांच साल का वक्त एक राष्ट्र के इतिहास में मायने नहीं रखता है लेकिन संदेश देने के लिए ही सही, बहुत ज़्यादा है। भरोसा जीतने के लिए ये लंबा समय होता है। शेरशाह इन्हीं पांच सालों में इतिहास में अमर हो गए। आप पर ज़िम्मेदारी ज्यादा है नीतिश जी, बिहार के लिए इतिहास के इस संक्रमण काल में नेतृत्व आप के हाथ में है ... इतिहास के कूड़ेदान में जाना है या मगध की गौरवकीर्ती वापस लानी है .... आपको ही तय करना है। हमारा क्या हम तो लिखते रहेंगे कुछ न कुछ .... आप तो गौरवशाली अतीत का पुननिर्माण कर रहे हैं। आपकी हार से आप से ज्यादा हम व्यथित हैं। संभालिए वरना ....


दूसरी तरफ़ लालू प्रसाद इन परिणामों से प्रसन्न दिखे और अपने चिरपरिचित अंदाज़ में कहा कि ये सेमी फ़ाइनल है और अगले विधानसभा चुनावों में राज्य में राजद की सरकार बनेगी. ज़ाहिर है बैकफूट पर खेल रहे लालू विकास की टीआरपी भी समझ चुके हैं। ऐसे में लालू हो या नीतिश मायने नहीं रखता है जो विकास की राह पर दौड़ने का माद्दा दिखाएगा सत्ता उसकी होगी। लड़ाई व्यक्तित्व के खांचे से निकल कर कृतित्व के दायरे में आ चुका है। नीतिश को ये सोचना होगा कि बिहार में उनको जनादेश किस लिए मिला है ? अगर वो राजनीति के उन्हीं पुराने प्रतिमानों को आज़माना चाहते हैं जिनका मुलम्मा छुट चुका है तो वो भुलावे में हैं। बिहार में नीतिश को मिला जनादेश बदलाव के लिए था न कि उनके व्यक्तित्व पर वो जनमत सर्वेक्षण था। उन्हें आगे जीतते रहना है तो ये सोचना होगा कि बदलाव की अभिव्यक्ति के लिए कौन से नए मुहावरे गढ़े जाएं। ज़ाहिर है उपचुनाव के ये परिणाम नीतिश को सही राह पर लाने के लिए बिहार की जनता की तरफ से एक झ‍टका है , अगर फिर भी नहीं संभले तो इससे भी बूरे परिणाम के लिए उन्हें तैयार रहना चाहिए।